(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.374. अध्यायः 374
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
ब्राह्मणेन नागामन्त्रणपूर्वकमिष्टदेशंप्रति प्रस्थानम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

ब्राह्मण उवाच। 12-374-0x(6679)(80730)
आश्चर्यं नात्र संदेहः सुप्रीतोस्मि भुजङ्गम।
अन्वर्थोपगतैर्वाक्यैः पन्थानं चास्मि दर्शितः॥ 12-374-1(80731)
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि साधो भुजगसत्तम।
स्मरणीयोस्मि भवता संप्रेषणनियोजनैः॥ 12-374-2(80732)
नाग उवाच। 12-374-3x(6680)
अनुक्त्वा हृद्गतं कार्यं क्वेदानीं प्रस्थितो भवान्।
उच्यतां द्विज यत्कार्यं यदर्थं त्वमिहागतः॥ 12-374-3(80733)
उक्तानुक्ते कृते कार्ये मामामन्त्र्य द्विजर्षभ।
मया प्रत्यभ्यनुज्ञातस्ततो यास्यसि सुव्रत॥ 12-374-4(80734)
न हि मां केवलं दृष्ट्वा त्यक्त्वा प्रणयवानिह।
गन्तुमर्हसि विप्रर्षे वृक्षमूलगतो यथा॥ 12-374-5(80735)
त्वयि चाहं द्विजश्रेष्ठ भवान्मयि न संशयः।
लोकोऽयं भवतः सर्वः का चिन्ता मयि तेऽनघ॥ 12-374-6(80736)
ब्राह्मण उवाच। 12-374-7x(6681)
एवमेतन्महाप्राज्ञ विदितात्मन्भुजङ्गम।
नातिरिक्तास्त्वया देवाः सर्वथैव यथातथम्॥ 12-374-7(80737)
स एव त्वं स एवाहं योऽहं स तु भवानपि।
अहं भवांश्च भूतानि सर्वे यत्र गताः सदा॥ 12-374-8(80738)
आसीत्तु मे भोगिपते संशयः पुण्यरसंचये।
सोहमुञ्छव्रतं साधो चरिष्याम्यर्थसाधनम्॥ 12-374-9(80739)
एष मे निश्चयः साधो कृतं कारणमुत्तमम्।
आमन्त्रयामि भद्रं ते कृतार्थोऽस्मि भुजङ्गम॥ ॥ 12-374-10(80740)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि चतुःसप्तत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ 374॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-374-4 उक्तानुक्ते पृष्टे अपृष्टेपि मयैव वात्सल्यात्कृते सति॥ 12-374-6 अहं त्वयि भक्तिमानिति शेषः॥ 12-374-8 यत्र चाहं स एव त्वमेवमाह भुजङ्गमेति ट. पाठः॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.